सिद्धार्थनगर: बेसिक शिक्षा विभाग में ‘कबाड़’ गाड़ियों से मलाई काटने का खेल!
शिक्षा विभाग की पोल-पट्टी: बिना फिटनेस-बीमा की गाड़ियाँ और लाखों का सरकारी गबन। सिद्धार्थनगर में भ्रष्टाचार का 'इंजन' गरम: जर्जर वाहनों से हो रही है खजाने की लूट।
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर: शिक्षा विभाग या भ्रष्टाचार की ‘जर्जर’ प्रयोगशाला?
- कागजों पर दौड़ती गाड़ियाँ, विभाग की गाड़ी ‘भ्रष्टाचार’ में सवार!
- शिक्षा विभाग का ‘नया पाठ’: बच्चों का भविष्य दरकिनार, बाबू की जेब का उद्धार।
- सिद्धार्थनगर शिक्षा विभाग: फाइलें हरी, गाड़ियाँ जर्जर और नियत में खोट!
- सिद्धार्थनगर: बेसिक शिक्षा विभाग में घोटालों की परतें, क्या जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज?
- अवैध वाहनों से सरकारी भुगतान का मामला: अब डीएम की जांच के घेरे में शिक्षा विभाग।
- लापरवाही या मिलीभगत? बिना इंश्योरेंस के चल रही विभागीय गाड़ियों की होगी जांच।
सिद्धार्थनगर का बेसिक शिक्षा विभाग इन दिनों शिक्षा की अलख जगाने के बजाय भ्रष्टाचार की नई-नई पटकथाएं लिखने के लिए चर्चा में है। विभाग की कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा लगता है कि मानो यहाँ नैतिकता और नियमों का अंतिम संस्कार बहुत पहले ही हो चुका है। ‘पीली नंबर प्लेट’ वाली टैक्स चोरी की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि विभाग ने भ्रष्टाचार का एक और ऐसा अध्याय खोल दिया है, जो न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि व्यवस्था की धज्जियों उड़ाने वाला है।
कागजों पर दौड़ती ‘कबाड़’ गाड़ियाँ
ताज़ा मामला विभाग द्वारा संचालित वाहनों का है। खबर है कि बेसिक शिक्षा विभाग उन गाड़ियों का बिल भुगतान कर रहा है, जो न केवल 2009 मॉडल की जर्जर हो चुकी हैं, बल्कि जिनका फिटनेस और इंश्योरेंस भी कागजों में वर्षों से मृत पड़ा है। सवाल यह है कि जो गाड़ियाँ सड़क पर चलने के योग्य ही नहीं हैं, उन्हें सरकारी काम में दौड़ते हुए दिखाकर जनता के खून-पसीने की कमाई का बंदरबांट किसके इशारे पर किया जा रहा है?
बाबूशाही का ‘बेखौफ’ तंत्र
इस पूरे खेल में विभाग के बाबू मिथिलेश कुमार की भूमिका पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है। लेकिन क्या एक बाबू की इतनी हिम्मत है कि वह विभाग के आला अधिकारियों की नाक के नीचे से सरकारी खजाने में सेंध लगा ले? यह बिना ‘ऊपर से नीचे तक’ मिलीभगत के संभव ही नहीं है। यह घटनाक्रम बताता है कि सिद्धार्थनगर के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार कोई चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित कार्यसंस्कृति बन चुका है।
जवाबदेही का सवाल: आखिर कब तक?
जिलाधिकारी शिवशरण अप्पा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तीन दिवसीय जांच टीम गठित करने का आश्वासन दिया है। यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन सिद्धार्थनगर की जनता इस रस्म-अदायगी से भली-भांति परिचित है। क्या यह जांच भी अन्य फाइलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी, या इस बार सच में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी?
शिक्षा विभाग का काम बच्चों के भविष्य को संवारना है, न कि जर्जर वाहनों और फर्जी बिलों के नाम पर सरकारी धन को चूना लगाना। यदि भ्रष्ट तंत्र पर कड़े प्रहार नहीं किए गए, तो यह विभाग जल्द ही ‘शिक्षा विभाग’ के बजाय ‘भ्रष्टाचार की जर्जर प्रयोगशाला’ के रूप में ही जाना जाएगा।
जवाबदेही से किनारा: अधिकारियों की ‘मौन स्वीकृति’ का खेल
मिथिलेश कुमार जैसे कर्मचारियों की संलिप्तता तो एक लक्षण मात्र है, असली बीमारी तो उच्च अधिकारियों की उस ‘कार्यशैली’ में है जो उन्हें सीधे तौर पर दोषी बनाती है। क्या यह संभव है कि विभाग के प्रमुखों को यह जानकारी न हो कि उनके कार्यालय में इस्तेमाल होने वाले वाहनों का न तो कोई वैध फिटनेस है, न ही बीमा?
- निरीक्षण का अभाव (Lack of Oversight): विभागीय प्रमुखों का प्राथमिक कार्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी धन का उपयोग नियमों के दायरे में हो। यदि वर्षों से पुरानी और अवैध गाड़ियाँ विभागीय कार्यों में लगी हैं, तो इसका सीधा अर्थ है कि अधिकारियों ने या तो अपनी आँखें मूँद रखी हैं या वे इस भ्रष्टाचार में बराबर के भागीदार हैं। बिना किसी उच्च अधिकारी के हस्ताक्षर या ‘नॉटिंग’ के सरकारी बिल पास होना असंभव है।
- हस्ताक्षर ही असली गवाह: फाइलें ऊपर से नीचे तक गुजरती हैं। एक बाबू बिल बनाता है, लेकिन उस पर मुहर लगाने और भुगतान की स्वीकृति देने वाले ‘साहब’ आखिर क्या देखकर हस्ताक्षर करते हैं? क्या वे कागजों की वैधता की जांच करने की जहमत तक नहीं उठाते, या फिर ‘कमीशन’ का गणित इतना सटीक होता है कि नियम और कायदे स्वतः ही गौण हो जाते हैं?
- प्रशासनिक विफलता: यह केवल एक वित्तीय घोटाला नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का ज्वलंत उदाहरण है। जब अधिकारी अपने ही विभाग के रिकॉर्ड्स की अनदेखी करते हैं, तो वे नैतिक रूप से बच्चों के भविष्य के प्रति भी उतने ही गैर-जिम्मेदार साबित होते हैं, जिनके लिए ये संसाधन आवंटित किए गए थे।
किसी भी सरकारी कार्यालय में ‘बाबू’ वही करता है जिसकी उसे ‘साहब’ से मौन स्वीकृति मिलती है। यदि जिलाधिकारी की जांच में केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर कार्रवाई होती है और ऊपर बैठे अधिकारी ‘पवित्र’ बनकर बच निकलते हैं, तो यह न्याय नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की एक सोची-समझी नीति होगी। सिद्धार्थनगर का बेसिक शिक्षा विभाग अब जवाबदेही के ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ ‘अज्ञानता’ का बहाना अब और नहीं चलेगा।
अब गेंद जिलाधिकारी के पाले में है—देखना यह है कि क्या वे इस दीमक रूपी भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा पाते हैं, या फिर यह ‘जांच’ केवल एक और लीपापोती साबित होगी?









